कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा संपूर्ण राष्ट्र में चलाए जा रहे ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन’ के तहत जनपद पौड़ी गढ़वाल के विभिन्न विकासखंडों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। जनपद के 12 चयनित क्लस्टरों में फसलों के उत्पादन और किसानों को इसके प्रभावी तरीकों से जोड़ने के लिए व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की गई है।
कृषि मंत्रालय, भारत सरकार एवं निदेशक कृषि, उत्तराखंड के दिशा-निर्देशों तथा वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय भरसार के कुलपति प्रोफेसर भगवती प्रसाद भट्ट के मार्गदर्शन में यह प्रशिक्षण अभियान शुरू हुआ है। कृषि विज्ञान केंद्र, भरसार के वैज्ञानिक एवं मिशन के नोडल अधिकारी डॉ. अंशुमान सिंह द्वारा जनपद के 1500 कृषकों को 5 चरणों में प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।
प्रथम चरण: पाबौ विकासखंड के 214 किसान हुए लाभांवित
प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रथम चरण का शुभारंभ 7 अक्टूबर 2026 को हुआ, जिसमें विकासखंड पाबौ के किसानों को प्रशिक्षित किया गया: 7 अक्टूबर 2026: पसीना क्लस्टर के ग्राम किंमडंग एवं पसीना के 96 कृषकों को प्रशिक्षण दिया गया।
8 अक्टूबर 2026: निशनी क्लस्टर के ग्राम बूड़की एवं रतकोटी के 98 किसानों को प्राकृतिक खेती की बारीकियां सिखाई गईं।
9 अक्टूबर 2026: ग्राम चुल्ला में 20 किसानों को व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। प्रथम चरण में पाबौ विकासखंड के कुल 214 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें स्थानीय कृषि अधिकारियों की भी सक्रिय उपस्थिति रही।
’जीरो बजट फार्मिंग’ से सुधरेगा मृदा स्वास्थ्य
प्रशिक्षण के दौरान डॉ. अंशुमान सिंह ने किसानों को बताया कि प्राकृतिक खेतीएक ‘जीरो बजट फार्मिंग’ मॉडल है, जिससे कम से कम लागत में अधिक से अधिक गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। जैविक कार्बन में वृद्धि: पहाड़ों की मिट्टी में घटते जैविक कार्बन (Organic Carbon) को बढ़ाने के लिए भारी मात्रा में गोबर की खाद के बजाय जीवामृत, बीजामृत एवं घनजीवामृत का प्रयोग अत्यंत लाभकारी है।
बद्री गाय का महत्व: पर्वतीय क्षेत्रों की देशी बद्री गाय के गोबर एवं गोमूत्र में करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु (Microorganisms) होते हैं, जो मृदा की उर्वरा शक्ति को तेज़ी से बढ़ाते हैं।
प्राकृतिक कीट नियंत्रण: फसलों को बीमारियों और कीटों से बचाने के लिए नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र एवं आग्नेयास्त्र जैसे प्राकृतिक अवयव बनाने और उनके छिड़काव की विधि का प्रयोगात्मक प्रदर्शन किया गया। ग्राम चुल्ला में विकसित हुआ ‘मॉडल फार्म’
डॉ. अंशुमान सिंह की देखरेख में ग्राम चुल्ला के प्रगतिशील कृषक राजेंद्र चमोली द्वारा विगत कुछ वर्षों से प्राकृतिक खेती के तहत सफलतापूर्वक फसलोंत्पादन किया जा रहा है। उनके फार्म को एक मॉडल फार्म के रूप में विकसित किया गया है, जहाँ से अन्य किसान प्रेरणा ले रहे हैं।
आगे का कार्यक्रम द्वितीय चरण: 13 अक्टूबर 2026 से प्रारंभ होगा, जिसमें विकासखंड थैलीसैण के चयनित क्लस्टरों के किसानों को प्रशिक्षित किया जाएगा।
अंतिम चरण: यह प्रशिक्षण अभियान 4 नवंबर 2026 को संपन्न होगा, जिसके तहत कुल 12 क्लस्टरों के 1500 किसानों को कवर किया जाएगा।

