कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा संपूर्ण राष्ट्र में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन कार्यक्रम का संचालन किया जा रहा है उपरोक्त कार्यक्रम के अंतर्गत जनपद पौड़ी गढ़वाल में भी कृषि विभाग ने जनपद के विभिन्न ब्लाकों में कुल 12 क्लस्टरों में प्राकृतिक खेती के तहत फसलोंत्पादन कराया जा रहा है इन क्लस्टरों के विभिन्न गांव के 1500 किसानों को प्रशिक्षण की नितांत आवश्यकता थीं प्रशिक्षण की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कृषि मंत्रालय भारत सरकार एवं कृषि निदेशक उत्तराखंड के आदेश के उपरांत वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय भरसार के कुलपति प्रोफेसर भगवती प्रसाद भट्ट के दिशा निर्देशन में कृषि विज्ञान केंद्र, भरसार के वैज्ञानिक डॉ. अंशुमान सिंह ( नोडल अधिकारी राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन) द्वारा जनपद पौड़ी गढ़वाल के 12 क्लस्टरों के 1500 किसानों को प्रशिक्षण देना प्रारंभ कर दिया गया है जिसमें प्रथम चरण में विकासखंड पाबौ के कुल 214 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, दूसरे चरण में विकासखंड थलीसैंण के 477 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया तथा तीसरे चरण में दिनांक 21 से 24 अक्टूबर 2026 तक विकासखंड एकेश्वर के 250 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है अभी तक कुल 941 कृषकों को डॉ अंशुमान सिंह द्वारा प्राकृतिक खेती पर प्रशिक्षण दिया जा चुका है प्राकृतिक खेती के चतुर्थ चरण में विकासखंड बीरोंखाल के 500 कृषकों को दिनांक 27 अक्टूबर 2026 से प्रशिक्षण दिया जाएगा,प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण में डॉक्टर अंशुमान सिंह ने किसानों को बताया की प्राकृतिक खेती जीरो बजट फार्मिंग है इसमें कम से कम लागत में अधिक से अधिक उत्पादन किया जा सकता है तथा प्राकृतिक खेती से मृदा के स्वास्थ्य में सुधार के साथ ही मृदा में जैविक कार्बन एवं जीवांश की मात्रा में वृद्धि होगी साथ ही मानव एवं पर्यावरण के लिए भी प्राकृतिक खेती अत्यंत हितकारी है जहां हमें टनों की मात्रा में गोबर की खाद की आवश्यकता होती है वहीं जीवामृत बनाकर कम से कम गोबर और गोमूत्र से अधिक से अधिक फसल उत्पादन किया जा सकता है हमारे पहाड़ की बद्री गाय के गोबर एवं गौ मूत्र में करोड़ों की संख्या में लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं जो की मृदा में सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बढ़ाकर मृदा में कम हो रहे जैविक कार्बन को बढ़ाते हैं हमारे पहाड़ की मृदा का जैविक कार्बन कम होता जा रहा है जिसको बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है इसको जीवामृत के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है प्राकृतिक खेती के मुख्य आयाम हैं जैसे : जीवामृत बीजामृत एवं घन जीवामृत जो की मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं इनको बनाने एवं खेत में उपयोग करने के बारे में डॉ अंशुमान सिंह ने किसानों को विस्तार पूर्वक प्रशिक्षण दिया साथ ही फसलों में लगने वाले कीट एवं बीमारियों के नियंत्रण के लिए प्राकृतिक अवयव में जैसे नीमांस्त्र , ब्रह्मास्त्र एवं आग्नेयास्त्र आदि को बनाने एवं इनके प्रयोग के बारे में किसानों को विस्तार पूर्वक प्रशिक्षण दिया , कृषि मंत्रालय की यह पहल पर्वतीय कृषि को कम लागत, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन पद्धतियों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। विश्वविद्यालय का कृषि विज्ञान केंद्र किसानों की क्षमता वृद्धि एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रसार के माध्यम से प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

