पौड़ी जनपद में अपने कार्यकाल के दौरान मुख्य विकास अधिकारी गिरीश गुणवंत ने जिस तरह गांव-गांव जाकर विकास योजनाओं को धरातल तक पहुंचाने का प्रयास किया, उसने उन्हें आम अधिकारियों से अलग पहचान दिलाई। उन्होंने केवल दफ्तरों तक सीमित रहकर काम नहीं किया, बल्कि जनपद के सभी विकासखंडों में पहुंचकर स्थानीय काश्तकारों, ग्रामीणों और महिला समूहों से सीधे संवाद स्थापित किया। उनका उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं का प्रचार करना नहीं, बल्कि ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाना था। महिला स्वयं सहायता समूहों को रीप योजना से जोड़ते हुए उन्होंने पिरूल आधारित उत्पाद, दुग्ध उत्पादन, अचार, जैम, जूस, बेकरी और अन्य स्थानीय उत्पादों के माध्यम से महिलाओं की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए। उनके प्रयासों से कई ग्रामीण परिवारों को गांव में ही रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिले। गिरीश गुणवंत को ऐसे अधिकारी के रूप में देखा गया जिसने पहली बार गांवों तक जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं और योजनाओं का वास्तविक लाभ पात्र लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया। लेकिन अब उनका तबादला होने के बाद राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक दबाव को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। चर्चाओं के अनुसार यमकेश्वर क्षेत्र में विधायक निधि के भुगतान को लेकर उन पर दबाव बनाया जा रहा था। बताया जा रहा है कि नियमों के तहत भुगतान से इनकार करने के बाद उनका तबादला कर दिया गया। यदि ईमानदारी से कार्य करने वाले अधिकारियों को इसी प्रकार राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ेगा, तो भविष्य में कोई भी अधिकारी दूरस्थ और चुनौतीपूर्ण जनपदों में काम करने से हिचकेगा। पौड़ी जैसे पर्वतीय जनपद को ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है जो केवल फाइलों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर विकास की सोच रखते हों। गिरीश गुणवंत का तबादला अब जनपद में प्रशासनिक कार्यशैली और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर नए सवाल खड़े कर रहा है..

