पौड़ी गढ़वाल में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली उत्तराखण्ड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार के कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) भगवती प्रसाद भट्ट के दिशा-निर्देशन में भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय तथा उत्तराखंड कृषि विभाग के राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत जनपद के विभिन्न विकासखंडों में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र, भरसार के वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के नोडल अधिकारी डॉ. अंशुमान सिंह के नेतृत्व में जिले के 12 क्लस्टरों में किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों की जानकारी दी जा रही है। प्रशिक्षण के प्रथम चरण में विकासखंड पाबौ के चयनित क्लस्टरों के 214 किसानों को 7, 8 और 9 अक्टूबर को प्रशिक्षण दिया गया। वहीं, दूसरे चरण में थलीसैंण विकासखंड के विभिन्न क्लस्टरों के 500 किसानों को 13 से 16 अक्टूबर तक प्रशिक्षित किया गया। इस तरह दोनों चरणों में कुल 714 किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। प्रशिक्षण के दौरान डॉ. अंशुमान सिंह ने किसानों को प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों, कम लागत में उत्पादन, मृदा स्वास्थ्य में सुधार और पर्यावरण संरक्षण के महत्व की जानकारी दी। उन्होंने जीवामृत, बीजामृत और घनजीवामृत तैयार करने तथा खेतों में इनके उपयोग की विधियां समझाईं। इसके साथ ही फसलों को कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र और आग्नेयास्त्र जैसे प्राकृतिक कीट एवं रोग नियंत्रण साधनों को तैयार करने और इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण भी दिया गया। पहाड़ी क्षेत्रों में मिट्टी के घटते जैविक कार्बन को बढ़ाने, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बनाए रखने और स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने पर विशेष जोर दिया गया। डॉ. सिंह ने बताया कि बद्री गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार जैविक घोल प्राकृतिक खेती में उपयोगी साबित हो सकते हैं और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान, किसानों ने बताई समस्या
प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने जंगली जानवरों से फसलों को हो रहे नुकसान की समस्या भी उठाई। किसानों के मुताबिक, जंगली जानवरों के कारण उनकी फसलों को लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक नुकसान पहुंच रहा है। इससे खेती की लागत और जोखिम बढ़ रहे हैं तथा किसानों का खेती के प्रति रुझान कम हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों से युवाओं के पलायन के पीछे भी किसानों ने इसे एक बड़ी चुनौती बताया। इस पर डॉ. अंशुमान सिंह ने किसानों को ऐसी फसलों के चयन की सलाह दी, जिन्हें जंगली जानवर अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने हल्दी, अदरक, गेंदा, बड़ी इलायची, मिर्च और औषधीय पौधों की खेती के साथ कीवी तथा नींबू वर्गीय फलदार पौधों के रोपण की संभावनाओं पर जानकारी दी। उन्होंने कहा कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसलों का चयन कर नुकसान के जोखिम को कम करने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं।
थलीसैंण की लाखोरी मिर्च का बेहतर बाजार मूल्य
थलीसैंण विकासखंड में लाखोरी मिर्च की खेती भी किसानों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। किसानों के अनुसार, यहां उत्पादित लाखोरी मिर्च को 800 से 900 रुपये प्रति किलोग्राम तक की दर से बेचा जाता है. प्रशिक्षण के दौरान डॉ. अंशुमान सिंह ने किसानों के खेतों में लगी मिर्च की फसल का निरीक्षण किया। उन्होंने फसल में लगने वाले कीटों और बीमारियों से बचाव के लिए प्राकृतिक खेती के तहत तैयार किए जाने वाले कीट एवं रोग नियंत्रण घोलों की विधि और उनके उपयोग की जानकारी दी। उन्होंने किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने तथा समय पर उचित प्रबंधन अपनाने के लिए प्रेरित किया।कार्यक्रम में थलीसैंण विकासखंड के ब्लॉक तकनीकी प्रबंधक विकास जोशी, क्लस्टर की कृषि सखियां, मास्टर ट्रेनर राजेंद्र प्रसाद और कृषि विभाग के अधिकारी मौजूद रहे।
21 अक्टूबर से एकेश्वर में शुरू होगा तीसरा चरण
प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यक्रम का तीसरा चरण 21 अक्टूबर 2026 से शुरू होगा। इस चरण में विकासखंड एकेश्वर के विभिन्न क्लस्टरों के किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह पहल पर्वतीय क्षेत्रों में कम लागत वाली खेती को प्रोत्साहित करने, मिट्टी की सेहत सुधारने, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण है। कृषि विज्ञान केंद्र, भरसार का उद्देश्य किसानों की क्षमता बढ़ाने और टिकाऊ कृषि तकनीकों का प्रसार कर प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करना है।

